Monday, February 20, 2012

तन्हा हूँ मै


कौन कहता है कि अकेला हूँ मै।
मेरे साथ मेरी तन्हाई है,
एक रूसवाई है,
और वो बेवफाई है,
      जिसके लिए मै आज भी शर्मिदां हूँ।
पल-पल कई हजार मौंते मरता
      मैं आज भी जिदां हूँ।

तुम हो, तुम्हारी यादें हैं मेरे साथ,
      और कुछ खत भी हैं।
जगी हुई सी कुछ रातें,
      और सिसकते हुए कुछ दिन भी हैं।
कुछ रोते हुए आंसू हैं,
      कुछ वीरानीयां हैं।
कुछ गुजरे हुए लम्हे,
      कुछ मेरी-तुम्हारी कहानियां है।
फिर कौन कहता है कि अकेला हूँ मै।

एक अधुरा सा चाँद है,
      जो अहसास करवाता है मुझे अपने अधुरे होने का।
वो जख्म भी सम्भाल कर रखा है मैने,
      जो दर्द को जिंदा रखे है तुम्हारे खोने का।
कुछ बिस्तर की सिलवटें हैं, करवटें हैं,
      आत्मा की पुकार है।
दिल के कोने मे सहेज कर रखा,
      तुम्हारा निस्वार्थ,निश्छल,निश्काम प्यार है।
फिर कौन कहता है कि अकेला हूँ मै।

लेकिन ये भी सच है कि तन्हा तो हूँ।
पर अच्छा लगता है मुझे यूँ ही रहना,
      तुम्हारी यादों के संग सोना,
और तुम्हे सोचते हुए जगना।
मैं खुश हूँ क्योंकि तुम खुश हो,
      बस यही बहुत है मेरे लिए।
जिंदगी के लिए, जिंदा रहने के लिए।

फिर कौन कहता है कि अकेला हूँ मै।
कौन कहता है कि तन्हा हूँ मै।।

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